प्रभु महावीर के जन्म की घोषणा होते ही जयकारों से गूंज उठा उपाश्रय
14 महास्वप्नों के प्रतीकों को पहनाई मोतियों की माला

रायपुर, 13 सितंबर 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास में शनिवार को पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के चौथे दिन भगवान महावीर स्वामी का जन्मोत्सव भक्तिभाव और उल्लास के साथ मनाया गया। मुनि संवेगरत्न सागर जी म.सा. के मुखारविंद से जैसे ही वीर प्रभु महावीर के जन्म की घोषणा हुई, पूरा धर्मसभा परिसर जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने अक्षत और पुष्पों की वर्षा कर अपनी श्रद्धा अर्पित की। थाली और घंटनाद से पूरा उपाश्रय भक्तिमय हो गया।
मुनिश्री ने धर्मसभा में भगवान महावीर के जन्म प्रसंग का वांचन किया। जन्म की घोषणा होते ही लाभार्थी परिवार ने थाली बजाकर खुशियां मनाईं। पालना जी के लाभार्थी परिवार ने प्रभु को पालने में झुलाया और मंगलगीत गाए। इसके बाद धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने भी पालना झुलाकर प्रभु के जन्मोत्सव की खुशियां साझा कीं। श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को बधाई दी और केसरिया छापे लगाए।
14 महास्वप्नों में छिपे आध्यात्मिक संदेश बताए
धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने भगवान महावीर की माता त्रिशला देवी को प्रभु के जन्म से पूर्व आए 14 महास्वप्नों का आध्यात्मिक महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि जैन दर्शन में इन महास्वप्नों को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है और इनके प्रतीकों में गहरे आध्यात्मिक संदेश निहित हैं।
मुनिश्री के अनुसार पहला स्वप्न सफेद हाथी का था, जो मिथ्यात्व के अंधकार से दूर होने का संकेत देता है। दूसरा स्वप्न वृषभ का था, जो गुणों को धारण करने की सामर्थ्य का प्रतीक है। तीसरा स्वप्न केसरी सिंह का था, जो सामर्थ्य और संयम का संदेश देता है। चौथा स्वप्न लक्ष्मी माता का था, जो गुण, वैभव और सम्यक दर्शन की प्रेरणा का प्रतीक माना गया।
पांचवें स्वप्न में पांच वर्णों के पुष्पों की युगल माला दिखाई दी, जो अशुभ कर्मों से दूर होकर शुभ कर्मों का वरण करने का संदेश देती है। छठा स्वप्न पूर्ण चंद्रमा का था, जो शीतलता का प्रतीक है, जबकि सातवां स्वप्न सूर्य का था, जो अंधकार दूर कर प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। आठवां स्वप्न धर्मध्वजा का था, जो धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
नौवां स्वप्न पूर्ण कलश का था, जिसे मंगल, पवित्रता और पूर्णता का प्रतीक माना गया। दसवां स्वप्न कमल सरोवर का था, जो संसार की मोह-माया से वैराग्य की ओर प्रेरित करता है। ग्यारहवां स्वप्न क्षीरसागर का था, जो ज्ञान की विशालता और गहराई का प्रतीक है। बारहवां स्वप्न दिव्य विमान का था, जो उच्च आध्यात्मिक दिव्यता का संकेत देता है।
तेरहवां स्वप्न रत्नों की राशि का था, जो अनमोल आध्यात्मिक संपदा का प्रतीक माना गया। वहीं चौदहवां स्वप्न धूम्ररहित अग्नि का था, जो शुद्धता, तेज और आध्यात्मिक ऊर्जा का संदेश देता है।
महास्वप्नों के प्रतीकों को पहनाई गई मोतियों की माला
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि धर्मसभा में माता त्रिशला देवी के 14 महास्वप्नों के चांदी से निर्मित प्रतीकों के श्रद्धालुओं को दर्शन कराए गए। लाभार्थी परिवारों ने सभी स्वप्नों के प्रतीकों को विधिपूर्वक बधाया और उन्हें मोतियों की माला पहनाई।
समिति की ओर से सभी लाभार्थी परिवारों का सम्मान किया गया। उन्हें भेंट स्वरूप महास्वप्नों की प्रतिकृतियां भी प्रदान की गईं।
भगवान महावीर के जन्मवांचन और माता त्रिशला देवी के 14 महास्वप्नों के दर्शन के साथ धर्मसभा भक्ति, श्रद्धा और उल्लास के वातावरण में संपन्न हुई।



