छत्तीसगढ़

बेदखली मामले में रेलवे को हाईकोर्ट से झटका, नोटिस प्रक्रिया को बताया त्रुटिपूर्ण

बिलासपुर, 8 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेलवे को बड़ा झटका देते हुए रेलवे की बेदखली संबंधी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी या रेलवे की जमीन से किसी भी कथित अतिक्रमणकारी को हटाने से पहले कानून के तहत स्पष्ट कारणों के साथ वैध नोटिस देना अनिवार्य है। न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने जिला अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए रेलवे की याचिका निरस्त कर दी।

मामला बुधवारी बाजार निवासी असलम हुसैन से जुड़ा है, जिन्हें दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने रेलवे भूमि पर अवैध कब्जाधारी बताते हुए लोक परिसर (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत बेदखली का आदेश जारी किया था। इस आदेश के खिलाफ असलम हुसैन ने जिला अदालत में अपील दायर की थी।

15 मई 2026 को जिला अदालत ने रेलवे के बेदखली आदेश को निरस्त करते हुए मामला दोबारा सक्षम अधिकारी के पास भेज दिया था। अदालत ने निर्देश दिया था कि रेलवे अधिनियम की धारा-4 के तहत स्पष्ट और विधिसम्मत नोटिस जारी कर मामले की नए सिरे से सुनवाई की जाए।

जिला अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए रेलवे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रेलवे की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा ने दलील दी कि कब्जाधारी को नोटिस दिया गया था, लेकिन उसने अपने पक्ष में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। रेलवे का तर्क था कि मामले को दोबारा भेजने से कार्रवाई में अनावश्यक देरी होगी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि रेलवे द्वारा जारी प्रारंभिक नोटिस में बेदखली के स्पष्ट और विशिष्ट आधारों का उल्लेख नहीं था। अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से पहले उसे कारण सहित वैध नोटिस देना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने माना कि जिला अदालत का फैसला पूरी तरह कानूनी और तर्कसंगत है तथा उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर रेलवे की रिट याचिका खारिज कर दी गई।

Related Articles

Back to top button