संपादकीय

टंकी फुल है… बस अफवाहों को ओवरफ्लो मत होने दीजिए…

-दुबेजी की दिव्यदृष्टि

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ते ही भारत में सबसे पहले जिस चीज़ को लेकर चिंता शुरू होती है, वह है पेट्रोल और डीजल। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाज़ार गर्म हुआ, पेट्रोल पंपों पर हलचल बढ़ी और लोगों ने “कहीं तेल खत्म न हो जाए” की आशंका में अतिरिक्त खरीदारी शुरू कर दी। हालात ऐसे बने कि छत्तीसगढ़ सरकार को आधिकारिक तौर पर सामने आकर कहना पड़ा कि “राज्य में ईंधन की कोई कमी नहीं है, घबराने की जरूरत नहीं।”

सरकार का यह बयान सिर्फ प्रशासनिक सफाई नहीं, बल्कि उस मनोविज्ञान की पहचान भी है जो संकट की आशंका भर से बाजार और समाज दोनों को अस्थिर कर देता है। दिलचस्प बात यह है कि सरकार को एक तरफ भरोसा दिलाना पड़ा कि टंकियां भरी हुई हैं, वहीं दूसरी तरफ ड्रम, बोतल और जेरीकेन में पेट्रोल-डीजल बेचने पर रोक भी लगानी पड़ी। यह फैसला साफ बताता है कि असली संकट ईंधन का नहीं, बल्कि “पैनिक” का था।

दरअसल, भारत जैसे देश में तेल सिर्फ वाहन चलाने का साधन नहीं है। यह अर्थव्यवस्था की धड़कन है। ट्रांसपोर्ट, खेती, उद्योग, अस्पताल, मोबाइल नेटवर्क से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी तक सब कुछ इससे जुड़ा है। इसलिए जैसे ही अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ता है, लोगों के मन में यह डर बैठ जाता है कि कहीं सप्लाई रुक न जाए या कीमतें अचानक आसमान न छू लें। यही डर जमाखोरी को जन्म देता है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने सही समय पर यह संदेश देने की कोशिश की कि राज्य में लगभग 4.35 करोड़ लीटर पेट्रोल और 8.15 करोड़ लीटर डीजल उपलब्ध है। साथ ही 2516 पेट्रोल पंपों और डिपो से नियमित सप्लाई जारी है। लेकिन सवाल यह है कि यदि स्थिति सामान्य है, तो फिर ड्रम और जेरीकेन में बिक्री पर प्रतिबंध क्यों लगाना पड़ा?

असल में यह प्रतिबंध प्रशासन की मजबूरी भी है और चेतावनी भी। सरकार समझती है कि अगर लोग जरूरत से ज्यादा ईंधन जमा करने लगेंगे तो कृत्रिम संकट पैदा हो जाएगा। यानी तेल की कमी नहीं होगी, लेकिन पंपों पर लंबी लाइनें और खाली टैंक दिखाई देने लगेंगे। यही अफवाहों की सबसे बड़ी ताकत होती है। कई बार बाजार वास्तविक संकट से नहीं, बल्कि संभावित संकट के डर से चरमरा जाता है।

यह पहली बार नहीं है जब भारत में ऐसा माहौल बना हो। महामारी के दौरान भी लोगों ने दवाइयों, ऑक्सीजन, राशन और जरूरी वस्तुओं की जमाखोरी शुरू कर दी थी। नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों को वास्तव में जरूरत थी, उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी। पेट्रोल-डीजल के मामले में भी यही खतरा है। अगर हर व्यक्ति अतिरिक्त भंडारण करने लगे, तो कुछ ही घंटों में वितरण व्यवस्था पर दबाव बढ़ जाएगा।

हालांकि सरकार ने किसानों, अस्पतालों, मोबाइल टावरों और शासकीय कार्यों जैसी जरूरी सेवाओं को राहत देकर संतुलन बनाने की कोशिश की है। यह जरूरी भी था, क्योंकि ईंधन का संकट सबसे पहले इन्हीं क्षेत्रों को प्रभावित करता है। खेती का मौसम हो, एंबुलेंस की आवाजाही हो या संचार सेवाएं, इनके लिए निर्बाध सप्लाई जरूरी है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब भी किसी वस्तु की बिक्री पर रोक लगती है, कालाबाजारी की आशंका बढ़ जाती है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस पर सख्ती से नजर रख पाएगा? क्या पेट्रोल पंप संचालक नियमों का पालन करेंगे? और क्या सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक सूचनाओं पर प्रभावी नियंत्रण हो पाएगा?

आज सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ईंधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा बनाए रखना है। सरकार का संदेश साफ है कि सप्लाई सामान्य है, लेकिन जनता का व्यवहार भी उतना ही जिम्मेदार होना चाहिए। क्योंकि कई बार अफवाहों का टैंक इतना भर जाता है कि वास्तविक संकट पैदा होने में देर नहीं लगती।

आखिरकार यह मामला सिर्फ पेट्रोल-डीजल का नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिक व्यवहार का भी है। यदि लोग संयम रखें, अफवाहों से बचें और जरूरत भर ही खरीदारी करें, तो किसी भी कृत्रिम संकट से आसानी से बचा जा सकता है। वरना “डर” हमेशा “कमी” से बड़ा संकट बन जाता है।

फिलहाल छत्तीसगढ़ सरकार का संदेश बेहद सीधा और व्यावहारिक है :
“टंकी फुल है… बस अफवाहों को ओवरफ्लो मत होने दीजिए।”

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