राजधानी में अवैध प्लाटिंग का खेल, बिल्डरों के जाल में फंस रहे खरीदार…

रायपुर, 27 जुलाई 2026। राजधानी रायपुर और उससे लगे ग्रामीण व शहरी विस्तार वाले इलाकों में अवैध प्लाटिंग का कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकारी नियमों को दरकिनार कर कई बिल्डर और भू-माफिया भोले-भाले लोगों को “वैध प्लॉट” का झांसा देकर करोड़ों रुपये की ठगी कर रहे हैं। स्थिति यह है कि कृषि भूमि, चारागाह, नाले की जमीन, कोटवारी भूमि और यहां तक कि सरकारी जमीनों तक पर कब्जा कर प्लॉट काटे जा रहे हैं। बाद में इन जमीनों पर मकान बनाने वाले खरीदार वर्षों तक निगम, राजस्व विभाग और अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर हो जाते हैं।
आउटर इलाकों में सबसे ज्यादा खेल
रायपुरा, सेजबहार, कांदुल, भाटागांव, गोकुल नगर, बिलाल नगर, डुंडा, मोतीनगर, बोरियाखुर्द और बोरियाकला जैसे इलाकों में तेजी से हो रही अवैध प्लाटिंग चिंता का विषय बन चुकी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में खाली पड़ी सरकारी और निजी जमीनों पर कब्जा कर प्लॉट काटे जा रहे हैं। कई मामलों में राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण कार्रवाई भी अधूरी रह जाती है।
कार्रवाई होती है, फिर लौट आते हैं कब्जाधारी
नगर निगम समय-समय पर अवैध प्लाटिंग हटाने, सड़क काटने और निर्माण तोड़ने जैसी कार्रवाई करता है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही लोग दोबारा सक्रिय हो जाते हैं। इससे आम लोगों के बीच यह भ्रम पैदा होता है कि संबंधित कॉलोनी या प्लाटिंग वैध है। कई मामलों में निगम ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई, लेकिन कार्रवाई की गति धीमी रहने से अवैध कारोबार पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है।
सरकारी जमीन भी नहीं सुरक्षित
आरोप है कि कुछ बड़े बिल्डर नाले, चारागाह, कोटवारी और अन्य सरकारी भूमि तक को अपने प्रोजेक्ट में शामिल कर बेच रहे हैं। ऐसे मामलों में खरीदारों को वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। राजधानी की कई कॉलोनियों के निवासी आज भी अपने अधिकारों के लिए सरकारी कार्यालयों और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं।
रेरा की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) का गठन खरीदारों के हितों की रक्षा और रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से किया गया था। लेकिन कई मामलों में इसकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि राजधानी में अनेक बिल्डरों के खिलाफ शिकायतें लंबित हैं, लेकिन कार्रवाई अपेक्षित गति से नहीं हो रही। कुछ अधिकारियों पर बिल्डरों के पक्ष में काम करने के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
ब्रोशर कुछ और, हकीकत कुछ और
रेरा की जांच में कई बार यह सामने आया कि बिल्डरों ने ब्रोशर और विज्ञापनों में जिन सुविधाओं का दावा किया, वास्तविक परियोजना उससे काफी अलग निकली। कई मामलों में जुर्माना भी लगाया गया, लेकिन इसके बावजूद नियमों के उल्लंघन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
रसूख के दम पर कब्जे के आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ भू-माफिया राजनीतिक पहुंच और रसूख का हवाला देकर जमीनों पर कब्जा करते हैं। कई बार निजी जमीनों को जानबूझकर विवादित बनाकर मालिकों पर दबाव बनाया जाता है, जिससे वे कम कीमत पर जमीन बेचने को मजबूर हो जाते हैं। इसके बाद वही जमीन ऊंची कीमत पर प्लॉट बनाकर बाजार में बेच दी जाती है।
पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल
जमीन से जुड़े फर्जी दस्तावेज, जबरन कब्जा और धोखाधड़ी के मामलों की शिकायतें लगातार पुलिस तक पहुंचती हैं। हालांकि छोटे मामलों में कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े और प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में जांच लंबी खिंचने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
आउटर क्षेत्र भू-माफियाओं के निशाने पर
गोगांव, गोंदवारा, भनपुरी और सिलतरा जैसे क्षेत्रों में पहले भी सरकारी भूमि पर अवैध प्लाटिंग के मामले सामने आ चुके हैं। नगर निगम ने कई स्थानों पर कार्रवाई कर जमीन को दोबारा ग्रीनलैंड घोषित किया था। अधिकारियों का कहना है कि मास्टर प्लान में कृषि अथवा हरित क्षेत्र घोषित भूमि पर अवैध प्लाटिंग पाए जाने पर ऐसी जमीन को फिर से मूल स्वरूप में लाने की कार्रवाई की जाएगी।
खरीदार रहें सतर्क
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्लॉट या मकान की खरीद से पहले संबंधित परियोजना की वैधता, रेरा पंजीयन, राजस्व अभिलेख, भूमि उपयोग (Land Use), नक्शा स्वीकृति और स्थानीय निकाय की अनुमति की जांच अवश्य करनी चाहिए। केवल विज्ञापन, ब्रोशर या मौखिक दावों के आधार पर निवेश करना भविष्य में गंभीर कानूनी और आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है.
राजधानी में तेजी से फैल रहे अवैध प्लाटिंग के इस कारोबार ने न केवल सरकारी जमीनों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि हजारों परिवारों के अपने घर के सपने को भी जोखिम में डाल दिया है। ऐसे में प्रभावी कार्रवाई, पारदर्शी जांच और दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग लगातार तेज होती जा रही है।



