छत्तीसगढ़धर्म-आध्यात्म

समयोपदेश वर्षायोग में गूंजे मुनि आगम सागर के प्रवचन

‘जैसे कर्म, वैसे परिणाम’, मुनिश्री ने नरक गति के कष्टों के जरिए समझाया पाप-पुण्य का सिद्धांत

रायपुर, 11 अगस्त 2026। दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय रोड में चल रहे दिगंबर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग 2026 के तहत मंगलवार को धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संतों की मंगल देशना हुई। प्रातःकाल भगवान के अभिषेक, शांतिधारा और पूजन के बाद मुनि संघ के सान्निध्य में धार्मिक कक्षाओं और स्वाध्याय का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में समाजजन इस दौरान मौजूद रहे।

समयोपदेश वर्षायोग समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जैन गुरुकृपा एवं कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन ने बताया कि प्रातः 8 बजे विभिन्न जिनालयों से आए समाजजनों की उपस्थिति में मूलनायक भगवान के समक्ष शांतिधारा संपन्न हुई। शांतिधारा का सौभाग्य नरेश-रीतु जैन पाटनी परिवार एवं यशवंत जैन-अमरचंद जैन परिवार को प्राप्त हुआ।

अभिषेक और शांतिधारा के बाद संतों की नवधाभक्ति के साथ आहारचर्या हुई। मुनि आगम सागर को आहार कराने का सौभाग्य श्रीमती शालिनी आनंद जैन, पूर्वा ग्राफिक्स, बढ़ईपारा, ललिता चौक को मिला। ऐलक धैर्य सागर को राजकुमार-संस्कार जैन भाटापारा परिवार एवं झाबक बाड़ा परिवार और ऐलक स्वागत सागर को श्रीमती पुष्पादेवी बंशीलाल जैन, जैन बाड़ा परिवार ने आहार कराया।

तत्त्वार्थ सूत्र और छह ढाला का स्वाध्याय

मुनि संघ के सान्निध्य में आयोजित धार्मिक कक्षा में मुनि पुनीत सागर ने तत्त्वार्थ सूत्र के तृतीय अध्याय का अध्ययन कराया। वहीं मुनि आगम सागर ने छह ढाला की प्रथम ढाल के माध्यम से नरक गति के स्वरूप और वहां मिलने वाले कष्टों का वर्णन करते हुए मंगल देशना दी।

मुनिश्री ने कहा कि नारकीय जीवों की प्यास इतनी तीव्र होती है कि तीन लोकों के समुद्र का पानी पीने के बाद भी उनकी प्यास नहीं बुझती। इसी तरह उनकी भूख भी अत्यधिक होती है। उन्होंने कहा कि जीवन में भोजन को लेकर असंतोष, दूसरों को भोजन न देना और भोजन में लगातार कमियां निकालना जैसे कर्मों के भी विपरीत परिणाम सामने आ सकते हैं।

मुनिश्री ने समझाया कि मनुष्य को अपने कर्मों के परिणाम को समझते हुए जीवन में संयम और संतोष अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाप और पुण्य की कड़ी लगातार जुड़ती रहती है। मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसलिए मन और विचारों को सकारात्मक रखते हुए बुरे कर्मों से बचना जरूरी है।

‘दिल बड़ा रखें, सबके कल्याण की सोचें’

मुनि आगम सागर ने कहा कि जीवन में केवल अपने सुख के बारे में नहीं, बल्कि दूसरों के हित के बारे में भी सोचना चाहिए। प्रेम और सद्भावना में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि दगा करने वाले व्यक्ति को भी अपना बनाया जा सके। उन्होंने लोगों से अपनी क्षमता पहचानने, दिल बड़ा रखने और दूसरों की बात सुनकर उनके कल्याण का प्रयास करने का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि सज्जन व्यक्ति सभी के हित की सोचता है, जबकि दुर्जन व्यक्ति स्वार्थ तक सीमित रहता है। पूर्व कर्मों का प्रभाव मनुष्य की बुद्धि और व्यवहार पर भी पड़ता है। इसलिए वर्तमान जीवन में अच्छे संस्कार, संयम और सदाचार को अपनाना आवश्यक है।

रात्रि भोजन त्यागने का दिया संदेश

मुनिश्री ने जैन समाज के लोगों से रात्रि भोजन का त्याग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दिगंबर मुनि दिन में एक समय नवधाभक्ति के साथ आहार और जल ग्रहण करते हैं। संयम और तपस्या के इसी मार्ग से साधु जीवन की प्रेरणा मिलती है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी दिनचर्या में भी संयम लाने का प्रयास करना चाहिए। दिन में भोजन करना, अभक्ष्य और अमर्यादित आहार से बचना तथा मन को पवित्र रखना धर्ममार्ग को मजबूत करता है।

मुनिश्री ने कहा कि पुण्य पूर्व जन्म के अच्छे संस्कारों से बनता है और वर्तमान जीवन के कर्म भविष्य की दिशा तय करते हैं। इसलिए जीवन में त्याग, संयम, संतोष और परोपकार को स्थान देकर व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर दिशा दे सकता है। धर्मसभा में उपस्थित समाजजनों ने मुनिश्री की मंगल देशना का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

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