रक्षाबंधन पर साधर्मियों की सेवा और धर्म-संस्कृति की रक्षा का लें संकल्प : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 27 अगस्त 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास 2026 के तहत धर्म, ध्यान, भक्ति, तप और आराधना का क्रम जारी है। बुधवार को आयोजित धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने रक्षाबंधन पर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे साधर्मियों की सेवा, वात्सल्य और धर्म-संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेने का पर्व बताया।
मुनिश्री ने कहा कि रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह पर्व साधर्मियों के प्रति वात्सल्य और सेवा की भावना को मजबूत करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि इस दिन संकल्प लेना चाहिए कि जीवनभर धर्म, संस्कृति और साधर्मियों की रक्षा के लिए तत्पर रहेंगे तथा जरूरत के समय अपने साधर्मियों के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे।
प्रेम के बिना रक्षा का संकल्प अधूरा
मुनिश्री संवेगरत्न सागर ने कहा कि धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, प्रकृति, स्वजन और स्वयं की रक्षा का संकल्प तभी सार्थक होता है, जब इनके प्रति हमारे भीतर प्रेम हो। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति या वस्तु से प्रेम होता है, उसकी रक्षा के लिए इंसान हर परिस्थिति में खड़ा रहता है। इसलिए धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, प्रकृति, स्वजनों और अपनी आत्मा के प्रति प्रेम की भावना विकसित करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि साधर्मियों के प्रति निश्छल प्रेम और वात्सल्य रखना ही रक्षाबंधन की वास्तविक भावना है। इसी कारण इस पर्व को वात्सल्य पर्व के रूप में भी देखा जाता है।
आत्मचिंतन के साथ मनाएं रक्षाबंधन
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से रक्षाबंधन के अवसर पर आत्मचिंतन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि वह धर्म और संस्कृति के संरक्षण में अपना क्या योगदान दे सकता है।
उन्होंने कहा कि केवल संकल्प लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अपने व्यवहार में उतारना जरूरी है। साधर्मियों की जरूरत में उनके साथ खड़ा होना, सेवा करना और धर्म-संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय रहना ही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता है।


