छत्तीसगढ़

मानव बन गए हैं, अब मानवता भी बचाए रखना जरूरी: मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 31 अगस्त 2026। ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने मानव जीवन की दुर्लभता समझाते हुए विचार, व्यवहार और कर्मों में संयम रखने तथा मानवता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का संदेश दिया।

विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में रविवार को विशेष प्रवचनमाला का आयोजन हुआ। मुनिश्री ने कहा कि मानव भव मिलना सौभाग्य है, लेकिन इस भव में वास्तव में मानव बनकर जीना सबसे बड़ी चुनौती है। प्रमाद और गलत कर्मों में जीवन व्यतीत करने से यह दुर्लभ अवसर व्यर्थ हो सकता है।

जीवन में भी जरूरी है ‘विचार का ब्रेकर’

मुनिश्री ने सड़क पर लगे ब्रेकर का उदाहरण देते हुए कहा कि तेज रफ्तार वाहन को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो दुर्घटना हो सकती है। इसी तरह जीवन में भी विचार का ब्रेकर होना चाहिए। धर्मपथ पर मिलने वाले कर्मों के संकेतों को समझकर समय रहते अपने आचरण में बदलाव करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि धर्मसभा में मिलने वाले संदेश भी लाल, हरी और पीली बत्ती की तरह संकेत देते हैं। जिनवाणी सुनने के बाद यदि व्यक्ति इन संकेतों को नहीं समझता और गलत कर्मों से नहीं रुकता तो कर्मों का बंधन उसका पीछा नहीं छोड़ता। इसलिए धार्मिक संदेशों को केवल सुनना नहीं, बल्कि जीवन में उतारना चाहिए।

धन-संपत्ति और सत्ता नहीं, धर्म जाएगा साथ

मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि पुण्य का उदय केवल लाभ देने वाला है या वास्तव में हितकारी भी है, इसका विवेक होना चाहिए। धन-संपत्ति का अभिमान नहीं करना चाहिए और हिंसा से जुड़े कर्मों से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आयु का कोई भरोसा नहीं है। सत्ता, संपत्ति और सांसारिक वैभव इसी भव तक सीमित हैं। मृत्यु के बाद मनुष्य के साथ केवल धर्म और उसके कर्म जाएंगे।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान बनना आसान नहीं, लेकिन मानव पर्याय मिलने के बाद वास्तव में मानव बनकर जीना भी बड़ी साधना है। अच्छा मानव बनने के लिए सत्संग, बड़ों का सम्मान और हिंसक, अप्रामाणिक तथा संस्कृति-विरोधी कार्यों का त्याग जरूरी है।

दया को बनाया धर्म का आधार

मुनिश्री ने कहा कि देव, गुरु और धर्म का सान्निध्य मिलने के बावजूद यदि व्यक्ति जीवन का मर्म नहीं समझ पाया तो इस भव को सार्थक करना कठिन है। किसी व्यक्ति के जीवन में दुख आए तो उसका फायदा नहीं उठाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दया धर्म का मूल है। ज्ञान से जितना जुड़ाव बढ़ेगा, जीवन उतना ही सुधरेगा। अशुभ कर्मों के अनुबंध को समय रहते रोकना जरूरी है, अन्यथा वही दुख, दुर्गति और पीड़ा का कारण बनते हैं।

सात्विक भोजन और परिवार के साथ संवाद पर जोर

मुनिश्री ने लोकविरुद्ध आचरण की चर्चा करते हुए सात्विक भोजन अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मिलावटी और अशुद्ध खाद्य-पेय पदार्थों के कारण लोग अनेक परेशानियों से घिर रहे हैं।

उन्होंने परिवार में साथ बैठकर भोजन करने की पुरानी परंपरा को भी महत्वपूर्ण बताया। साथ बैठकर भोजन करने से परिवार में आपसी संवाद, मधुरता और एकजुटता बनी रहती है। इसलिए परिवार के सदस्यों को साथ बैठकर सात्विक भोजन करने की आदत को बढ़ावा देना चाहिए।

सोशल मीडिया के दुरुपयोग से बचने की सलाह

मुनिश्री ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि लोग घंटों सोशल मीडिया में व्यस्त रहकर अपना कीमती समय गंवा रहे हैं और धीरे-धीरे धर्म तथा कर्म से दूर होते जा रहे हैं।

उन्होंने मर्यादा का ध्यान रखने, स्वतंत्रता को परतंत्रता का कारण नहीं बनने देने और विश्वासघात से बचने की सीख दी। उन्होंने कहा कि जीवन में पुण्य-पाप का बोध विकसित हो जाए तो व्यक्ति धर्म के मार्ग से आसानी से नहीं भटकता।

31 अगस्त से शुरू होगा अक्षय निधि समवशरण विजय कषाय तप

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि सर्वमंगलमय वर्षावास में तप की श्रृंखला जारी है। 49 दिवसीय पंच परमेष्ठी श्रेणी तप की अंतिम श्रेणी 31 अगस्त से शुरू होगी।

इसी दिन से 16 दिवसीय अक्षय निधि समवशरण विजय कषाय तप का भी शुभारंभ होगा। मुनि संवेगरत्न सागर आदि ठाणा की पावन निश्रा में सोमवार सुबह 8:30 बजे मंगल कलश की स्थापना की जाएगी।

तपस्वी 16 दिनों में 15 दिन लगातार एकासना और 16वें दिन उपवास करेंगे। अक्षय निधि तप पूर्ण होने के बाद 8 दिवसीय मोक्ष तप शुरू होगा, जिसमें सात दिनों तक एकासना और एक दिन उपवास किया जाएगा।

सर्वमंगलमय वर्षावास के दौरान प्रतिदिन श्रावक-श्राविकाएं मुनि भगवंतों से जिनवाणी का श्रवण कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।

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