ईर्ष्या मन में भरे तो क्रोध बन जाती है : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 3 सितंबर 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास में धर्म, तप, स्वाध्याय और आत्मचिंतन की साधना जारी है। मुनि संवेगरत्न सागर प्रतिदिन आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग समझा रहे हैं। गुरुवार की धर्मसभा में उन्होंने क्रोध के कारणों पर चर्चा करते हुए ईर्ष्या को भी क्रोध का प्रमुख कारण बताया।
अपने पुण्य-पाप का करें आकलन
मुनिश्री ने कहा कि किसी दूसरे के प्रति ईर्ष्या करने से मन में अशांति पैदा होती है और यही अशांति आगे चलकर क्रोध का रूप ले सकती है। व्यक्ति यदि अपने पुण्य और पाप का आकलन करे तो दूसरों के प्रति जलन की भावना कम हो सकती है। जीवन में जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह अपने कर्मों का परिणाम है। इस सत्य को समझ लेने पर दूसरों की उपलब्धियों को देखकर मन में ईर्ष्या नहीं रहेगी।
उन्होंने कहा कि दूसरों की उन्नति देखकर जलने के बजाय उनके अच्छे कर्मों और गुणों की प्रशंसा करनी चाहिए। इससे मन में सकारात्मक भाव बढ़ते हैं और नकारात्मक विचारों का प्रभाव कम होता है।
क्रोध में खो जाता है सही-गलत का विवेक
मुनिश्री ने कहा कि जब क्रोध कषाय का उदय होता है तो व्यक्ति का बल और आवेश कई गुना बढ़ जाता है। इस अवस्था में वह सही और गलत का विवेक खो सकता है और आवेश में ऐसे कार्य कर बैठता है, जिसका परिणाम बाद में स्वयं उसे भुगतना पड़ता है।
क्रोध व्यक्ति के व्यवहार, वाणी और निर्णयों पर भी नियंत्रण कमजोर कर देता है। कई बार गुणीजनों और संतों के समझाने के बाद भी व्यक्ति क्रोध के प्रभाव में अपने अच्छे संस्कार और सदाचार तक छोड़ देता है।
क्रोध से परिवार और समाज में बढ़ता है तनाव
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध केवल व्यक्ति को ही दुखी नहीं करता, बल्कि उसके व्यवहार का असर परिवार और समाज पर भी पड़ता है। क्रोध में बोले गए कटु वचन रिश्तों में दूरी पैदा करते हैं और मन में वैर-विरोध की भावना को जन्म देते हैं। यही नकारात्मक भाव आगे चलकर दुख, पीड़ा और दुर्गति का कारण बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि जीवन में दुख और पीड़ा की इस श्रृंखला से बचना है तो क्रोध का त्याग करना होगा। इसके लिए व्यक्ति को अपने भीतर उठ रहे क्रोध के भाव को पहचानकर उसे समय रहते शांत करने का प्रयास करना चाहिए। आत्मचिंतन, संयम, क्षमा और विवेक के माध्यम से क्रोध पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
धर्म को सुनें नहीं, जीवन में उतारें
मुनि संवेगरत्न सागर ने श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि धर्म के सिद्धांत केवल सुनने तक सीमित नहीं रहने चाहिए। ‘आतुर प्रत्याख्यान’ में दिए गए मार्गदर्शन को अपने व्यवहार और जीवन में उतारने से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।
वर्षावास के दौरान ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं धर्मसभा में शामिल होकर मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं। तप, त्याग, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के माध्यम से श्रद्धालु आत्मशुद्धि की साधना में जुटे हुए हैं।



