क्रोध पर विजय पाना है तो मौन साधना सीखें : मुनिश्री संवेगरत्न सागर

रायपुर, 5 सितंबर 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास के दौरान धर्म, तप और आत्मचिंतन की साधना जारी है। धर्मसभा में मुनिश्री संवेगरत्न सागर आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग बता रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने क्रोध से बचने के उपायों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मौन से क्रोध पर पाया जा सकता है नियंत्रण
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध पर विजय प्राप्त करनी है तो मौन का अभ्यास जरूरी है। व्यक्ति को यह विवेक होना चाहिए कि कब बोलना आवश्यक है और कब मौन रहना उचित है। वचन शक्ति का उपयोग भी विवेकपूर्वक किया जाना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक शब्द कई बार ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं, जिसे संभालना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है और इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए मौन साधना का अभ्यास महत्वपूर्ण है।
अभिमान और अपेक्षा से जन्म लेता है क्रोध
मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि क्रोध का जनक अभिमान और क्रोध की जननी अपेक्षाएं हैं। अभिमान, अपेक्षा और ईर्ष्या समेत कई कारण व्यक्ति को क्रोधित करते हैं। क्रोध की तपिश इतनी तीव्र होती है कि व्यक्ति दूसरों को नुकसान पहुंचाने के साथ खुद का भी अहित कर बैठता है।
उन्होंने कहा कि अभिमान हावी होने पर व्यक्ति देव, गुरु और धर्म के प्रति भी क्रोध कर सकता है। इससे बचने के लिए विनम्रता अपनाना और अभिमान का त्याग करना आवश्यक है।
क्रोध से दुख और पीड़ा का सृजन
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध और अभिमान से दुख, दुर्गति और पीड़ा पैदा होती है। क्रोध की इस परंपरा से बाहर निकलने के लिए सदाचार का पालन जरूरी है। व्यक्ति को अपने व्यवहार में विवेक और संयम को स्थान देना चाहिए।
क्रोध से बचने के लिए पांच बातों का रखें ध्यान
मुनिश्री ने धर्मसभा में क्रोध से बचने के लिए पांच बातों पर विशेष ध्यान देने की बात कही।
- गुरु और बड़ों पर विश्वास रखें।
- सत्य पता होने के बावजूद यदि उसे कहने का अधिकार नहीं है तो मौन रहना चाहिए।
- सत्य पता है और उसे कहने का अधिकार भी है तो पहले यह देखें कि सामने वाला आपकी बात सुनेगा या स्वीकार करेगा।
- सत्य, अधिकार और पुण्य होने के बावजूद यह विचार जरूरी है कि उस सत्य को प्रस्तुत करने की उचित भाषा आपके पास है या नहीं।
- अपेक्षाओं की उपेक्षा व्यक्ति के पुण्य-पाप और कर्मों के परिणाम पर निर्भर करती है।
मुनिश्री ने कहा कि इन बातों पर गंभीरता से विचार करने से व्यक्ति क्रोध पर विजय प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर सकता है। विनम्रता, मौन, विवेक और सदाचार को जीवन में उतारना ही क्रोध से मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।



