हृदय आंगन में प्रभु महावीर का जन्म हो, ऐसी भावना होनी चाहिए’: मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 14 सितंबर 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में सर्वमंगलमय वर्षावास के अंतर्गत चल रहे पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के दौरान मुनिश्री ने कहा कि हर व्यक्ति के हृदय आंगन में प्रभु महावीर का जन्म हो जाए, ऐसी भावना होनी चाहिए। प्रभु महावीर का जन्म केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मजागृति के उदय का प्रतीक है।
मेरु पर्वत पर हुआ भगवान महावीर का अभिषेक
मुनिश्री ने भगवान महावीर के जन्म के बाद के प्रसंग को विस्तार से समझाते हुए बताया कि परमात्मा महावीर के जन्म के पश्चात स्वयं इंद्र उन्हें मेरु पर्वत पर लेकर जाते हैं। वहां अभिषेक की तैयारी के दौरान इंद्र को ऐसा प्रतीत होता है कि परमात्मा का स्वरूप बहुत छोटा है, जबकि अभिषेक के लिए रखे गए कलश बहुत बड़े-बड़े हैं।
इंद्र के मन में इस बात को लेकर शंका उत्पन्न होती है। मुनिश्री ने बताया कि परमात्मा ने स्वयं इस शंका का समाधान किया। जब परमात्मा ने मेरु पर्वत को चलायमान किया तो इंद्र की शंका दूर हो गई। इसके बाद भगवान महावीर का विधि-विधान से अभिषेक किया गया।
अभिषेक के पश्चात इंद्र परमात्मा को लेकर पुनः क्षत्रिय कुंड नगरी पहुंचे।
प्रियंबदा ने महाराजा सिद्धार्थ को सुनाई पुत्र जन्म की खुशखबरी
मुनिश्री ने भगवान महावीर के जन्म की सूचना महाराजा सिद्धार्थ तक पहुंचने का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि मधुरमुखी प्रियंबदा महाराजा सिद्धार्थ के पास पहुंचीं और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति का समाचार सुनाया।
पुत्र जन्म की सूचना मिलते ही महाराजा सिद्धार्थ अत्यंत प्रसन्न हुए। खुशी में उन्होंने प्रियंबदा को रत्न और आभूषण प्रदान किए।
मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर के जन्म का यह प्रसंग हमें अपने भीतर भी आध्यात्मिक चेतना के जन्म की प्रेरणा देता है। जब हृदय में अहिंसा, प्रेम, करुणा और आत्मकल्याण की भावना जागती है, तभी जीवन में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है।
जन्मोत्सव पर जयकारों से गूंज उठा ज्ञानवल्लभ उपाश्रय
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि शनिवार शाम विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में भगवान महावीर स्वामी का जन्मोत्सव भक्तिभाव से मनाया गया।
मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. के मुखारविंद से जैसे ही प्रभु महावीर के जन्म की घोषणा हुई, पूरी धर्मसभा जयकारों से गूंज उठी। श्रद्धालुओं ने अक्षत और फूलों की वर्षा कर अपनी खुशी व्यक्त की। वहीं लाभार्थी परिवार ने थाल बजाकर उत्सव मनाया और पालना झुलाते हुए मंगलगीत गाए।
इस दौरान श्रद्धालुओं ने भी भक्तिभाव से भगवान के पालने को झुलाया और जन्मोत्सव की खुशियां मनाईं।
14 महास्वप्नों में छिपा आत्मशुद्धि और धर्म का संदेश
धर्मसभा में मुनिश्री ने माता त्रिशला देवी के 14 महास्वप्नों का आध्यात्मिक महत्व भी बताया। उन्होंने कहा कि इन महास्वप्नों में आत्मशुद्धि, संयम, ज्ञान, वैराग्य और धर्म का गहरा संदेश निहित है।
धर्मसभा में 14 महास्वप्नों के चांदी से निर्मित प्रतीकों के दर्शन कराए गए। लाभार्थी परिवारों ने इन प्रतीकों को विधिपूर्वक बधाकर मोतियों की माला पहनाई।
चातुर्मास समिति की ओर से सभी लाभार्थी परिवारों का सम्मान किया गया और उन्हें महास्वप्नों की प्रतिकृतियां भेंट की गईं।
मुनिश्री ने धर्मसभा में संदेश दिया कि भगवान महावीर के जीवन और उनके सिद्धांतों को केवल सुनने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि सत्य, अहिंसा, संयम और आत्मजागृति को अपने जीवन का हिस्सा बनाया जाए। यही प्रभु महावीर के जन्मोत्सव की वास्तविक सार्थकता है।



