जहां लोभ है, वहां अन्य कषायों की कतार है : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 7 अक्टूबर 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में मंगलवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने लोभ कषाय से सावधान रहने का संदेश दिया। आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने लोभ ध्यान के स्वरूप और उससे उत्पन्न होने वाले अन्य कषायों की व्याख्या की।
मुनिश्री ने कहा कि मानव भव प्राप्त करने के बाद भी जीव उस गर्त को भरने में लगा है, जो कभी भरता ही नहीं। अधिक पाने की लालसा ही लोभ कषाय है। लोभ ध्यान अन्य ध्यानों और कषायों की उत्पत्ति का कारण बनता है। जहां लोभ है, वहां अन्य कषायों की कतार है।
मुनिश्री ने कहा कि किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा लोभ ध्यान से उत्पन्न होती है। उसकी प्राप्ति के लिए जीव माया में प्रवृत्त होता है। अधिक प्राप्ति की अभिलाषा मोह को जन्म देती है और प्राप्त पदार्थ को बनाए रखने के लिए मान का ध्यान आता है। इच्छानुसार स्थिति न रहने पर क्रोध उत्पन्न होता है। इस प्रकार एक लोभ कषाय जीव को अनेक कषायों में उलझा देता है।
मुनिश्री ने कहा कि लोभ ध्यान के साथ द्वेष आदि भाव भी उत्पन्न होते हैं। संसार में जीव अनंत भवों से धर्मश्रवण करता आया है, फिर भी लोभ कषाय में उलझा रहता है। लोभ जीव को विषय-पदार्थों की ओर आकर्षित कर आत्मस्वरूप से दूर करता है।
मुनिश्री ने कहा कि लोभ ध्यान अत्यंत शीघ्र विकसित होने वाला है। इससे सावधान रहकर लोभ से आत्मा का संरक्षण करना चाहिए। बाह्य पदार्थों की प्राप्ति के बजाय आत्मकल्याण की दिशा में पुरुषार्थ करना है।



