छत्तीसगढ़

उत्कर्ष के समय मन को स्थिर रखें, ईर्ष्या से बचें : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 20 अगस्त 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में बुधवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने जीवन में आचार को ऊंचा बनाए रखने, अनाचार से बचने और सुख-दुख की परिस्थितियों में मन को स्थिर रखने का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति जीवन में जिस भूमिका और स्थिति में है, वहां से नीचे गिरना अनाचार कहलाता है। पूर्व भव में किए गए कर्म इस भव में रिएक्शन के रूप में सामने आते हैं और प्रायश्चित ही इस कर्म-परंपरा को समाप्त करने का मार्ग है।

मुनिश्री ने कहा कि प्रायश्चित नहीं करने पर पूर्व भव के कर्मों का प्रभाव बना रहता है और दुख, दुर्गति एवं पीड़ा की श्रृंखला चलती रहती है। जीवन में जब उत्कर्ष का समय आए तो मन को स्थिर रखना चाहिए, क्योंकि कोई भी उत्कर्ष स्थायी नहीं होता। उपलब्धियों के प्रति राग और आसक्ति आगे चलकर दुख का कारण बन सकती है। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे व्यक्ति की उन्नति देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ईर्ष्या व्यक्ति को अनाचार की दिशा में ले जाती है।

साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास करें

मुनिश्री ने कहा कि जीवन में आगे बढ़ना है तो साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए और इसके लिए गुरु भगवंतों का मार्गदर्शन एवं आसरा लेना चाहिए। केवल क्रिया से कर्म बंध नहीं होता, बल्कि क्रिया के पीछे के परिणाम और भाव भी कर्मबंधन का कारण बनते हैं। इसलिए अशुभ परिणामों से बचने के लिए अपने क्रियाकलापों और भावों पर विवेकपूर्वक नियंत्रण रखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अशुभ का अनुबंध जीव को अनंत संसार के भ्रमण में डाल देता है। भोग की इच्छा को टालने का प्रयास करना चाहिए और भोग की आतुरता को योग के स्वरूप में परिवर्तित करना चाहिए। व्यक्ति के भाव ही उसके भव को बिगाड़ते हैं। उसके भीतर आचार का ध्यान चल रहा है या अनाचार का, यही उसकी आगे की गति को निर्धारित करता है।

विवेक ही आत्मकल्याण का मार्ग

मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि जीवन में सदैव विवेक जागृत रहना चाहिए। अनाचार को छोड़ने का पराक्रम और आचार-अनाचार के बीच अंतर करने का ज्ञान आवश्यक है। यही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।

धर्मसभा में 28 उपवास करने वाले तपस्वी विजय संचेती का चातुर्मासिक समिति की ओर से सम्मान किया गया। धर्मसभा के पश्चात मुनिश्री से मांगलिक प्राप्त कर गिरनार नेमी तप से जुड़े करीब 150 तपस्वियों ने सामूहिक व्यासना किया। चातुर्मास में श्रावक-श्राविकाएं जिनवाणी के श्रवण के साथ तप और साधना के माध्यम से आत्मकल्याण के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।

Related Articles

Back to top button