Battle of Haifa: अब इज़राइल के बच्चे पढ़ेंगे भारतीय सैनिकों की वीर गाथा
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शहीद हुए भारतीय सैनिकों को हाइफा शहर में दी गई श्रद्धांजलि
हाइफा/नई दिल्ली, 29 सितंबर 2025। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शहीद हुए भारतीय सैनिकों को सोमवार को इज़राइल के हाइफा शहर में श्रद्धांजलि दी गई। इस मौके पर हाइफा के मेयर योना याहाव ने कहा कि शहर की स्कूल की इतिहास पुस्तकों में बदलाव किया जा रहा है, ताकि बच्चों को यह सही जानकारी मिल सके कि हाइफा को ओटोमन शासन से ब्रिटिश नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों ने आज़ाद कराया था।
मेयर याहाव ने समारोह में कहा, “मैं यहीं पैदा हुआ और यहीं से पढ़ाई की, लेकिन हमें हमेशा बताया गया कि शहर को ब्रिटिश ने मुक्त कराया। बाद में इतिहास के एक जानकार ने मुझे शोध के दस्तावेज दिखाए और सच्चाई सामने आई कि यह काम भारतीय सैनिकों ने किया था।”
यह कार्यक्रम हाइफा में स्थित बलिदानी भारतीय सैनिकों के कब्रिस्तान में आयोजित हुआ, जहां बड़ी संख्या में लोग उनकी वीरता को याद करने पहुंचे। मेयर याहाव ने 2009 में भी इसी स्थल पर ऐलान किया था कि स्कूल की किताबों में यह इतिहास शामिल होगा। अब यह युवाओं के बीच एक स्थापित तथ्य के रूप में दर्ज हो रहा है।
इतिहासकारों के अनुसार, 1918 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय घुड़सवार रेजिमेंट ने तलवार और भाले लेकर माउंट कार्मेल की कठिन ढलानों से ओटोमन सेना को पीछे धकेलते हुए हाइफा को मुक्त कराया था। इसे युद्ध का आखिरी बड़ा घुड़सवार अभियान माना जाता है।
भारतीय सैनिकों ने बदला इतिहास का रुख
साल 1884 में जब हेनरी मैक्सिम ने मैक्सिम मशीन गन का आविष्कार किया, तब से माना जाने लगा कि घुड़सवार हमले अब युद्ध में अप्रचलित हो गए हैं। लेकिन 23 सितंबर 1918 को, वर्तमान इज़राइल के हाइफा शहर में, भारतीय सैनिकों ने इतिहास का रुख बदल दिया।
निर्णायक दिन: 23 सितंबर 1918
माउंट कार्मेल की ढलानों पर जोधपुर लांसर्स की घुड़सवार टुकड़ी ने भाले और तलवारों के साथ तुर्की की मजबूत मोर्चाबंदी पर सीधा हमला बोला। ओटोमन सेना मशीनगनों और तोपों से लैस थी, फिर भी भारतीय जवानों की वीरता भारी पड़ी। इस हमले में मैसूर और हैदराबाद की सेनाएं रिज़र्व में थीं, जबकि अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व पूरी तरह जोधपुर लांसर्स ने किया।
मेजर दलपत सिंह शेखावत की शहादत
इस ऐतिहासिक जंग में मेजर दलपत सिंह शेखावत ने अपनी जान की आहुति दी। उनकी बहादुरी को आज भी “हाइफा का नायकत्व” कहा जाता है। उनकी अगुवाई ने 400 साल पुराने तुर्की शासन का अंत कर दिया।
तोपों पर भारी पड़ीं तलवारें
भारतीय सैनिकों के हाथों में सिर्फ तलवारें और भाले थे, जबकि सामने दुश्मन के पास आधुनिक हथियार थे। इसके बावजूद यह घुड़सवार हमला सफल रहा। इतिहासकारों का मानना है कि यह मानव साहस और घोड़ों की गति का अद्वितीय संगम था।
निर्णायक जीत
हाइफा की लड़ाई में तुर्कों और जर्मनों ने बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण किया। इस संघर्ष में 8 भारतीय सैनिक शहीद हुए और 34 घायल हुए, जबकि 1,350 से अधिक तुर्क और जर्मन सैनिक बंदी बनाए गए। इनमें 23 ओटोमन अधिकारी, 2 जर्मन अधिकारी और 664 अन्य सैनिक शामिल थे। तुर्कों के कुल हताहतों का आंकड़ा आज भी अज्ञात है।
अंतिम बड़ा घुड़सवार हमला
इतिहास में इससे पहले या बाद में कभी भी कोई घुड़सवार हमला इस तरह सफल नहीं रहा। जोधपुर लांसर्स ने असंभव को संभव कर दिखाया और इस जंग को हमेशा के लिए “हाइफा का युद्ध” कहा जाने लगा। सैन्य इतिहासकार आज भी इस अभूतपूर्व साहस को समझने में हैरान हैं।
आज की स्मृति
भारतीय सेना हर साल 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है। इस दिन 1918 में हाइफा को मुक्त कराने वाली तीन भारतीय घुड़सवार रेजिमेंट – मैसूर, हैदराबाद और जोधपुर लांसर्स – को सम्मानित किया जाता है। हर साल भारतीय मिशन और हाइफा नगर निगम संयुक्त रूप से इन बहादुर सैनिकों की शहादत को नमन करते हैं।
वहीं, इज़राइल के स्कूलों की किताबों में अब यह दर्ज है कि हाइफा को ब्रिटिश नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों ने मुक्त कराया था। यह गाथा भारतीय जांबाजों के शौर्य और बलिदान की जीती-जागती मिसाल है।



