छत्तीसगढ़

धर्मांतरण पर सख्ती: छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 विधानसभा में पारित

रायपुर, 19 मार्च 2026। रायपुर में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन प्रदेश की सियासत में बड़ा फैसला लिया गया। विजय शर्मा द्वारा विधानसभा में पेश “छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026” ध्वनिमत से पारित हो गया। इसके साथ ही राज्य में धर्मांतरण से जुड़े नियमों को लेकर एक सख्त कानूनी ढांचा लागू हो गया है।

बिना अनुमति धर्म परिवर्तन अब अपराध

नए कानून के तहत अब कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे पहले जिला प्रशासन को निर्धारित प्रारूप में आवेदन देना होगा। तय समय सीमा के भीतर अनुमति लेना अनिवार्य होगा। बिना अनुमति या सूचना के किया गया धर्म परिवर्तन अवैध माना जाएगा।

कानून में सजा का भी कड़ा प्रावधान किया गया है। जबरन, लालच देकर या धोखे से धर्मांतरण कराने पर न्यूनतम 7 साल की सजा से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है। इसके अलावा ऐसे मामलों में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

सदन में हंगामा, कांग्रेस का वॉकआउट

विधेयक पेश होते ही विधानसभा में तीखी बहस शुरू हो गई। विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए जोरदार विरोध किया। विपक्ष ने सरकार पर समाज में ध्रुवीकरण का आरोप लगाया और अंततः सदन से वॉकआउट कर दिया।

विपक्ष की गैरमौजूदगी में सत्ता पक्ष ने विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस दौरान सदन का माहौल काफी गरम रहा।

सरकार का पक्ष: आस्था की सुरक्षा

गृह मंत्री विजय शर्मा ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि यह कानून किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि अवैध और जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि इससे प्रदेश की “भोली-भाली जनता की आस्था” को सुरक्षा मिलेगी और गलत तरीकों से किए जाने वाले मतांतरण पर रोक लगेगी।

संवेदनशील इलाकों पर रहेगा असर

सरकार का मानना है कि इस कानून से बस्तर, जशपुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में लंबे समय से चल रहे विवादों पर नियंत्रण मिलेगा। इन इलाकों में धर्मांतरण को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं।

आगे बढ़ेगी कानूनी और राजनीतिक बहस

हालांकि, इस कानून के लागू होने के बाद इसके प्रावधानों को लेकर बहस तेज होने के संकेत हैं। कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के बीच इसके प्रभाव और वैधानिक पहलुओं पर चर्चा जारी रहने की संभावना है।

फिलहाल, इस फैसले को साय सरकार के बड़े राजनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिसने अपने प्रमुख वादे को कानून का रूप दे दिया है।

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