छत्तीसगढ़

ईरान-अमेरिका संघर्ष के वैश्विक संकट में पाकिस्तान का स्वार्थी रवैया

-विकल्प नंदा

2026 में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़े संघर्ष ने पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र में भू-राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर दी है। इस संकटपूर्ण दौर में, पाकिस्तान की स्थिति अत्यंत जटिल हो गई है। भौगोलिक निकटता और रणनीतिक विवशताओं के कारण, पाकिस्तान इस संघर्ष में एक अनपेक्षित ‘समस्या’ के रूप में उभरकर सामने आया है।

पाकिस्तान की ईरान के साथ लंबी सीमा है। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि संघर्ष के व्यापक होने से बलूचिस्तान प्रांत में अशांति का खतरा बढ़ गया है, जिससे पाकिस्तान के लिए अपनी सीमाओं की सुरक्षा करना एक बड़ी चुनौती बन गई है। यह स्थिति क्षेत्र में सुरक्षा जोखिमों को और अधिक गहरा करती है।

पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी दुविधा ‘संतुलन’ की है। एक तरफ, पाकिस्तान के ईरान के साथ सांस्कृतिक और ऊर्जा-संबंधी गहरे संबंध हैं। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान पर निर्भर रहने का इच्छुक रहा है। दूसरी तरफ, अमेरिका के साथ उसके सुरक्षा और वित्तीय संबंध हैं, जिस पर पाकिस्तान की डगमगाती अर्थव्यवस्था काफी हद तक टिकी है। अमेरिकी नीति निर्माताओं ने पाकिस्तान पर स्पष्ट दबाव बनाया है कि वह ईरान के साथ किसी भी प्रकार के सैन्य सहयोग से पूरी तरह दूर रहे।

आर्थिक प्रतिबंधों के कारण पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ किसी भी प्रकार का लेन-देन ‘खतरे का खेल’ बन गया है। यदि पाकिस्तान ईरान के साथ व्यापारिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाता है, तो उस पर अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार लटक सकती है। इसके विपरीत, ईरान से दूरी बनाने पर क्षेत्र में पाकिस्तान की रणनीतिक प्रासंगिकता कम हो सकती है।

अंततः, पाकिस्तान का दृष्टिकोण ईरान को अलग-थलग होने से बचाने और अमेरिका के साथ संबंधों को बनाए रखने के बीच झूल रहा है। यह संघर्ष पाकिस्तान के लिए केवल एक पड़ोसी का संकट नहीं है, बल्कि उसके घरेलू स्थायित्व और भविष्य की विदेश नीति की कठिन परीक्षा है। फिलहाल, पाकिस्तान का ‘तटस्थ’ रहने का प्रयास क्षेत्र में एक बड़ी पहेली बना हुआ है।

Related Articles

Back to top button