
चीन और ईरान के बीच सैन्य और रणनीतिक संबंध हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के केंद्र में रहे हैं। 2026 में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच शुरू हुए संघर्ष के दौरान इन संबंधों ने एक नया और संवेदनशील मोड़ लिया है। चीन ने आधिकारिक तौर पर इस संघर्ष में तटस्थता बनाए रखने और कूटनीतिक मध्यस्थता पर जोर देने की नीति अपनाई है, लेकिन जमीन पर स्थिति अधिक जटिल दिखाई देती है।
सैन्य और खुफिया सहयोग के आरोप
फरवरी 2026 में संघर्ष की शुरुआत के बाद से, कई रिपोर्टों और खुफिया आकलन में यह संकेत मिले हैं कि चीन की कंपनियां ईरान को ‘दोहरे उपयोग’ वाली तकनीकें प्रदान कर रही हैं। इसमें रडार सिस्टम, नेविगेशन उपकरण और मिसाइल पुर्जे शामिल हैं, जो ईरान की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं।
सैन्य और खुफिया सहयोग
फरवरी 2026 में संघर्ष की शुरुआत के बाद से, कई रिपोर्टों और खुफिया आकलन में यह संकेत मिले हैं कि चीन की कंपनियां ईरान को ‘दोहरे उपयोग’ वाली तकनीकें प्रदान कर रही हैं। इसमें मिसाइल पुर्जे शामिल हैं।
इसके अलावा, अमेरिकी खुफिया स्रोतों ने आरोप लगाया है कि चीन की कंपनियां ईरान को भू-स्थानिक खुफिया जानकारी भी प्रदान कर रही हैं, जिसका उपयोग ईरान अपनी रक्षात्मक तैयारियों के लिए कर रहा है।
अप्रैल 2026 में, ऐसी खबरें सामने आईं कि चीन ईरान को मैन-पोर्टेबल एयर-डिफेंस सिस्टम (MANPADS) भेजने की तैयारी कर रहा है, हालांकि बीजिंग ने इन दावों को “आधारहीन” बताते हुए दृढ़ता से खारिज कर दिया। चीनी विदेश मंत्रालय का कहना है कि वे सैन्य निर्यात के मामले में बहुत ही जिम्मेदार अपनाते हैं।
आर्थिक आधार और रणनीतिक विवशता
चीन और ईरान के बीच सैन्य सहयोग का एक गहरा आर्थिक आधार भी है। वर्ष 2021 में हस्ताक्षरित 25-वर्षीय रणनीतिक सहयोग समझौता दोनों देशों के संबंधों की धुरी है। इसके तहत, चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जो ईरान के तेल निर्यात का 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है।
आने वाले समय में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चीन अपनी कूटनीतिक सक्रियता को और बढ़ाता है या ईरान के साथ अपने संबंधों को केवल आर्थिक दायरे तक ही सीमित रखता है।



