छत्तीसगढ़

कैंसर से लड़ रही पत्नी, उम्मीदों से लड़ रहा पति…

जब एंबुलेंस नहीं मिली, तो लकड़ी की पटिया बनी पत्नी की स्ट्रेचर

कवर्धा, 11 नवंबर 2025। कहते हैं कि गरीबी इंसान को हर दर्द से बड़ा बना देती है, लेकिन कभी-कभी यही गरीबी उसकी असहायता की सबसे करुण तस्वीर बन जाती है। छत्तीसगढ़ के कवर्धा ज़िले से एक ऐसा ही दृश्य सामने आया है जिसने सबको भावुक कर दिया है। यहां एक आदिवासी व्यक्ति अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी को लकड़ी की पटिया पर लिटाकर बाइक पर अस्पताल तक ले जा रहा है, क्योंकि उसके पास न एंबुलेंस के पैसे बचे हैं, न किराए पर वाहन लेने की क्षमता।

सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो में दिख रहा है कि पति समलु सिंह मरकाम अपनी पत्नी कपुरा बाई मरकाम को लकड़ी की पटिया पर सुलाकर सड़क के गड्ढों और धूल भरे रास्तों से गुजर रहा है। चेहरे पर थकान है, लेकिन आंखों में उम्मीद बाकी है — कि कहीं से कोई मदद मिल जाए, ताकि उसकी पत्नी की साँसें कुछ और दिन चल सकें।

पत्नी को बचाने की जद्दोजहद
रेंगाखार तहसील के नगवाही गांव के आदिवासी दंपती की कहानी आज पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनी है। कपुरा बाई पिछले कई महीनों से कैंसर से लड़ रही हैं। समलु ने अब तक अपनी पूरी जमा-पूंजी इलाज में खर्च कर दी, पर हालत में सुधार नहीं हुआ। गांव से लेकर कवर्धा तक, और कवर्धा से रायपुर तक, वह हर अस्पताल के चक्कर लगा चुका है।

कुछ दिन पहले उसने गृह मंत्री विजय शर्मा से मदद की गुहार लगाई थी। मंत्री ने तत्काल ₹10,000 की आर्थिक सहायता दी और महिला को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज शुरू भी हुआ, पर जब हालत और बिगड़ी, तो डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए।

लेकिन समलु ने उम्मीद नहीं छोड़ी, उसने लकड़ी की पटिया बनाई, बाइक पर बांधी और पत्नी को उसी पर लिटाकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक ले जाना शुरू कर दिया। अब उसके पास न खाने को है, न दवा के पैसे, पर जज़्बा अभी भी बाकी है।

“यह तस्वीर सिर्फ गरीबी की नहीं… यह सवाल है उस सिस्टम से जो वादे तो बहुत करता है, लेकिन ज़रूरत के वक्त नज़र नहीं आता। छत्तीसगढ़ के कवर्धा से आई इस तस्वीर ने इंसानियत को झकझोर दिया है — एक आदिवासी पति अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी को इलाज के लिए लकड़ी की पटिया पर लिटाकर बाइक से अस्पताल ले जा रहा है। वजह सिर्फ एक — उसके पास अब न पैसे बचे हैं, न कोई सरकारी मदद।”

“अब बस सरकार से उम्मीद है…”
थके हुए समलु ने मीडिया से बात करते हुए कहा : “मैं अपनी पत्नी को बचाना चाहता हूं, पर अब कुछ नहीं बचा। इलाज में जो था सब खर्च हो गया। गाड़ी किराए पर लेने तक के पैसे नहीं हैं। इसलिए बाइक पर ही ले जाता हूं। अब बस सरकार या कोई भला इंसान मदद कर दे।”

उसकी आवाज़ में टूटन थी, लेकिन शब्दों में दृढ़ता, एक पति की आखिरी उम्मीद का प्रतीक।

ग्रामीणों की गुहार
स्थानीय ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से अपील की है कि इस परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता और बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाए। ग्रामीणों ने बताया कि यह परिवार कई बार सरकारी दफ्तरों और नेताओं के चक्कर काट चुका है, लेकिन आज तक कोई ठोस मदद नहीं मिली।

व्यवस्था पर उठते सवाल
यह घटना सिर्फ एक गरीब आदिवासी परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि एक प्रणालीगत असमानता का आईना भी है। करोड़ों रुपये के स्वास्थ्य योजनाओं और प्रचार के बीच एक व्यक्ति अपनी पत्नी को पटिया पर लिटाकर अस्पताल ले जाने को मजबूर है — यह सवाल उठाता है कि आखिर क्या हमारी व्यवस्था ज़मीन तक कभी पहुंचेगी?

यह दृश्य न केवल दर्दनाक है, बल्कि यह संवेदनहीन तंत्र पर करारा प्रहार भी है। जहां एक ओर अफसरशाही और भ्रष्टाचार में अरबों के खेल चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर किसी गरीब का जीवन कुछ हज़ार की मदद पर टिका है।

यह कहानी सिर्फ कवर्धा की नहीं — यह कहानी उस भारत की है, जहाँ इंसान अब भी उम्मीद के सहारे ज़िंदा है…

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