अज्ञान ही आत्मा को भटकाता है, जिनवाणी का ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 5 अगस्त 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास के दौरान मंगलवार को आयोजित धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि जीव के अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटकने का सबसे बड़ा कारण अज्ञान है। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य जिनवाणी के माध्यम से सही ज्ञान प्राप्त कर जीवन की सही दिशा नहीं समझेगा, तब तक मोक्ष का मार्ग कठिन बना रहेगा।
मुनिश्री ने कहा कि वीतरागों के वचनों से ही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है। वीतरागों के प्रति श्रद्धा, विनय और अनुग्रह की भावना रखने वाला व्यक्ति उनके उपदेशों के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि अज्ञान के प्रति पक्षपात और ज्ञान के प्रति दुर्भाव रखना ही अज्ञान ध्यान है, जो जीव को बार-बार जन्म-मरण के चक्र में डालता है।
उन्होंने अज्ञान के तीन स्वरूप बताते हुए कहा कि संशय, विपरीत मान्यता और अनुपयोगी ज्ञान मनुष्य को सत्य से दूर ले जाते हैं। प्रभु के वचन केवल सुविधा नहीं, बल्कि पुरुषार्थ और आत्मकल्याण की प्रेरणा देते हैं। जो व्यक्ति स्वयं संशय में रहता है, वह दूसरों के मन में भी संशय उत्पन्न करता है। सांसारिक सुखों को ही वास्तविक सुख मानना भी अज्ञान का ही रूप है। उन्होंने कहा कि यदि वर्षों तक पूजा-पाठ और धर्म साधना करने के बाद भी सही भावना विकसित नहीं होती, तो साधक अपने लक्ष्य से भटक जाता है।
मुनिश्री ने जैन शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता का पहला कर्तव्य अपने बच्चों को देव, गुरु और धर्म से जोड़ना है। यही परिवार और समाज के वास्तविक कल्याण का आधार है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अज्ञान का त्याग कर ज्ञान और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होने का आह्वान किया।
13 वर्ष की आयु में 8 उपवास,सभी ने की अनुमोदन
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुणिया और महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि सर्वमंगलमय वर्षावास-2026 के दौरान तपस्या का क्रम लगातार जारी है। मंगलवार को आरवी झाबक की अठाई तपस्या जारी रही। मात्र 13 वर्ष की आयु में आठ उपवास की कठिन तपस्या करने पर धर्मसभा में उनका बहुमान किया गया और उपस्थित श्रद्धालुओं ने तपस्विनी की अनुमोदना की। इस तपस्या में आठ दिनों तक केवल गर्म पानी का सेवन सुबह 10 बजे से शाम साढ़े चार बजे तक ही किया जाता है।
45 श्रद्धालु कर रहे पंच परमेष्ठी श्रेणी तप
समिति के अनुसार पंच परमेष्ठी श्रेणी तप की प्रथम श्रेणी पूर्ण होने के बाद दूसरी श्रेणी का पहला उपवास मंगलवार को संपन्न हुआ। इस कठिन तप में 45 श्रावक-श्राविकाएं सहभागी हैं। श्रेणी तप के अंतर्गत एक उपवास के बाद व्यासना, फिर दो उपवास, तीन उपवास और क्रमशः आगे तप का पालन किया जाता है। यह 49 दिनों की कठिन तप साधना है।
8 अगस्त से शुरू होगा गिरनार तप
चातुर्मास समिति ने बताया कि 8 अगस्त से 28 अगस्त तक गिरनार तप का आयोजन होगा। इस तप में नौ उपवास, नौ व्यासना, एक तेला और उसके बाद पारणा किया जाएगा। अब तक 80 श्रावक-श्राविकाओं ने गिरनार तप के लिए अपना पंजीयन करा लिया है।



