रानी अब्बक्का चौटा: पुर्तगालियों की नाक में दम करने वाली ‘अभय रानी’

भारत के इतिहास में जितने वीर पुरुष हुए, उतनी ही वीरांगनाएँ भी हुईं जिन्होंने अपने साहस और पराक्रम से विदेशी शक्तियों को नतमस्तक किया। इन्हीं में से एक नाम है रानी अब्बक्का चौटा, कर्नाटक के उल्लाल राज्य की तुलुवा जैन रानी, जिन्हें इतिहास “भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी” के रूप में याद करता है।
1525 में जन्मी अदम्य योद्धा
रानी अब्बक्का चौटा का जन्म 1525 में उल्लाल (कर्नाटक) में हुआ था। वे चौटा राजवंश से थीं — जो एक जैन बंट राजवंश था और 12वीं से 18वीं शताब्दी के बीच तुलुनाडु क्षेत्र पर शासन करता था। अब्बक्का अपने अद्भुत रणनीतिक कौशल, धनुर्विद्या, और विशेष रूप से “अग्निबाण” के उपयोग के लिए प्रसिद्ध थीं।
उनकी वीरता और निर्भीकता के कारण ही उन्हें “अभय रानी” कहा गया।
पुर्तगालियों से टक्कर: जब रानी ने दिखाया लोहा
1555 का साल था। पुर्तगाली साम्राज्य उस समय भारत के पश्चिमी तटों पर अपनी पकड़ मजबूत कर चुका था — कालीकट, बीजापुर, दमन, मुंबई, गोवा उनके कब्जे में थे। इसके बाद उनकी नजर मंगलूर बंदरगाह पर पड़ी, लेकिन उनके रास्ते में मात्र 14 किलोमीटर दूर उल्लाल का छोटा-सा राज्य था — जिसकी रानी थीं 30 वर्षीय अब्बक्का चौटा।
पुर्तगालियों ने पहले कुछ सैनिक भेजे, परंतु कोई वापस नहीं लौटा। इसके बाद एडमिरल डॉम अल्वेरो डि सिल्विएरा को भेजा गया, जो बुरी तरह पराजित होकर लौटा। तीसरी कोशिश भी नाकाम रही।
जब चौथी बार पुर्तगालियों ने मंगलूर पर कब्जा कर लिया, उन्होंने यह सोचकर उल्लाल की ओर बढ़ने की हिम्मत की कि रानी अब्बक्का का किला अब आसानी से जीता जा सकेगा।
‘शेरनी’ की तरह टूट पड़ी रानी
जनरल जोओ पीक्सीटो के नेतृत्व में पुर्तगाली सेना उल्लाल पहुंची तो किला खाली मिला। वे बिना लड़े जीत का जश्न मनाने लगे। लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी — रानी अब्बक्का अपने 200 वीर सैनिकों के साथ अचानक उन पर टूट पड़ीं। इस अचानक हमले में जनरल समेत अधिकतर पुर्तगाली सैनिक मारे गए और बाकी ने आत्मसमर्पण कर दिया।
इसके बाद रानी ने रातोंरात मंगलूर पोर्ट पर भी हमला किया और पुर्तगाली मुख्य अधिकारी को मारकर बंदरगाह को मुक्त करा लिया।
विश्वासघात और बलिदान
इतिहास कहता है कि रानी की हार किसी युद्ध में नहीं, बल्कि विश्वासघात में हुई। उनके अपने पति ने धन के लालच में पुर्तगालियों से मिलकर उन्हें पकड़वा दिया। रानी अब्बक्का को कैद कर लिया गया, और 1570 में एक विद्रोह के दौरान जेल में ही उनका निधन हो गया।
इतिहास की उपेक्षित नायिका
दुःख की बात यह है कि इतनी वीर महिला, जिसने चार दशकों तक विदेशी ताकतों को हराया, हमारी इतिहास की किताबों में कहीं दर्ज नहीं है। अगर रानी अब्बक्का यूरोप या अमेरिका में जन्मी होतीं, तो शायद उन पर दर्जनों किताबें और फ़िल्में बन चुकी होतीं।
आज भी जीवित है उनकी विरासत
उनकी स्मृति में हर वर्ष “वीरा रानी अब्बक्का उत्सव” उल्लाल में धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाली वीर और प्रतिष्ठित महिलाओं को ‘वीरा रानी अब्बक्का पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाता है।
रानी अब्बक्का चौटा केवल दक्षिण भारत की नहीं, बल्कि पूरे भारत की शान हैं। एक ऐसी रानी, जिसने यह साबित किया कि “देशभक्ति किसी साम्राज्य की नहीं, बल्कि हर उस हृदय की होती है जो मातृभूमि के लिए धड़कता है।”



