छत्तीसगढ़

रविवि में संकाय नेतृत्व नियुक्ति पर उठे सवाल: मानकों के बीच घिरा उच्च शिक्षा तंत्र

रायपुर, 19 मई 2026। छत्तीसगढ़ की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर चर्चा और विवाद के केंद्र में आ गई है। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU), रायपुर द्वारा जारी एक अधिसूचना के बाद विश्वविद्यालयी नियुक्तियों की पारदर्शिता, नियामकीय मानकों के पालन और योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों, प्राचार्यों और विभिन्न हितधारकों के बीच इस नियुक्ति को लेकर व्यापक बहस शुरू हो गई है।

विश्वविद्यालय द्वारा 14 मई 2026 को जारी अधिसूचना क्रमांक 3415/अका./2026 के माध्यम से डॉ. रिया तिवारी को छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 27(4) के तहत ग्रेसियस कॉलेज ऑफ एजुकेशन, बेलभाठा (अभनपुर) में प्राचार्य स्तर की जिम्मेदारियों के साथ विधि संकाय का संकायाध्यक्ष (डीन) नियुक्त किया गया है। इसी नियुक्ति को लेकर अब कई कानूनी, प्रशासनिक और शैक्षणिक प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

न्यायिक फैसलों ने बढ़ाई गंभीरता
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न न्यायालय उच्च शिक्षा संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर सख्त रुख अपनाते रहे हैं। विशेष रूप से पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले का उल्लेख इस मामले में किया जा रहा है। उस प्रकरण में राजनीति विज्ञान के एक प्रोफेसर की यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज के निदेशक पद पर नियुक्ति को अदालत ने निरस्त कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि विशिष्ट शैक्षणिक संस्थानों में नेतृत्वकारी पदों पर केवल उन्हीं व्यक्तियों की नियुक्ति हो सकती है, जिनके पास संबंधित विषय क्षेत्र की निर्धारित योग्यता और अनुभव हो।

इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय भी कई मामलों में यह दोहरा चुका है कि यूजीसी, एनसीटीई या अन्य वैधानिक संस्थाओं द्वारा निर्धारित योग्यता मानकों की अनदेखी कर की गई नियुक्तियां कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकतीं।

एनसीटीई और यूजीसी मानकों पर उठे सवाल
शिक्षा संकाय से जुड़े पदों के लिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा स्पष्ट मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इन मानकों के अनुसार शिक्षक शिक्षा संस्थानों में डीन या प्राचार्य स्तर की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति के पास शिक्षा विषय में विशेषज्ञता, एम.एड. की डिग्री, शिक्षा में पीएचडी तथा पर्याप्त शिक्षण अनुभव होना आवश्यक माना जाता है।

अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या वर्तमान नियुक्ति इन विषय-विशेष योग्यता मानकों को पूरा करती है? विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अब तक इस संबंध में सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।

वरिष्ठ संकाय की अनदेखी का आरोप
विश्वविद्यालय और संबद्ध महाविद्यालयों में कार्यरत कई वरिष्ठ प्राचार्यों और शिक्षा संकाय के अनुभवी सदस्यों की उपलब्धता के बावजूद यह अतिरिक्त प्रभार किस आधार पर सौंपा गया, इसे लेकर भी असंतोष सामने आ रहा है। वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक की वरिष्ठता सूचियों का हवाला देते हुए कुछ शिक्षाविदों ने दावा किया है कि कई पात्र वरिष्ठ अधिकारियों की उपेक्षा की गई है।

धारा 27(4) के उपयोग पर बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 27(4) अस्थायी अथवा अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था के लिए बनाई गई थी, लेकिन इसका उपयोग यदि नियमित चयन प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए किया जाता है, तो यह संस्थागत पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करता है।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई पर्यवेक्षकों ने मांग की है कि विश्वविद्यालय यह स्पष्ट करे कि नियुक्ति से पहले क्या तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया था? क्या सभी पात्र उम्मीदवारों पर विचार हुआ? और क्या यूजीसी, एनसीटीई तथा अन्य नियामकीय संस्थाओं के मानकों का परीक्षण विधिवत किया गया?

पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज
शिक्षक शिक्षा से जुड़े पदों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यही पद भविष्य के शिक्षकों की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम संचालन और शैक्षणिक दिशा तय करते हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि डीन और प्राचार्य जैसे पदों पर नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही आवश्यक है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब कई मांगें सामने आ रही हैं, जिनमें प्रमुख रूप से:
नियुक्ति प्रक्रिया और पात्रता मानकों का सार्वजनिक खुलासा
यूजीसी, एनसीटीई और अन्य नियामकीय नियमों के अनुपालन पर विश्वविद्यालय का आधिकारिक स्पष्टीकरण
राज्य अथवा केंद्रीय स्तर पर स्वतंत्र जांच
राज्य के शिक्षा संकायों में हुई नियुक्तियों का व्यापक ऑडिट जैसी बातें शामिल हैं।

विश्वविद्यालय और शासन की प्रतिक्रिया पर टिकी निगाहें
फिलहाल इस मुद्दे को लेकर शिक्षा जगत में चर्चा लगातार तेज हो रही है। अब सभी की निगाहें पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय प्रशासन, कुलपति कार्यालय और राज्य के उच्च शिक्षा विभाग की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस मामले में स्पष्टता नहीं लाई गई, तो यह विवाद उच्च शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और संस्थागत शासन पर व्यापक असर डाल सकता है।

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