छत्तीसगढ़

23 साल की सेवा का सम्मान: 60 कर्मियों के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर, 15 जून 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा नगर निगम के 60 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के पक्ष में अहम फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उनके नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने सरकार को 180 दिनों के भीतर सभी मामलों की नए सिरे से समीक्षा करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल सेवा में मामूली अंतराल (ब्रेक इन सर्विस) या वित्तीय कारणों का हवाला देकर लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वर्षों से स्थायी प्रकृति का कार्य लेने के बावजूद कर्मचारियों को अस्थायी बनाए रखना शोषण की श्रेणी में आता है।

मामले में याचिकाकर्ता मनीष मिश्रा सहित 60 कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कर्मचारियों का कहना था कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1997 से 2000 के बीच हुई थी और वे पिछले 23 से 24 वर्षों से लगातार सेवाएं दे रहे हैं। राज्य शासन ने वर्ष 2008 के नियमितीकरण संबंधी प्रावधानों के बावजूद उनका दावा यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि उनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 1997 के बाद हुई थी और सेवा अवधि में एक माह से अधिक का अंतराल रहा है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार एक “संवैधानिक नियोक्ता” है और समान परिस्थितियों में कार्यरत अन्य कर्मचारियों को नियमित किए जाने के बाद इन कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य शासन और नगर निगम कोरबा को निर्देश दिया है कि सभी 60 कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावों की निष्पक्ष और नए सिरे से समीक्षा कर 180 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए। इस फैसले को लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

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