छत्तीसगढ़

जीवन में उपकार का भाव प्रगति का आधार : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 10 अगस्त 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास के दौरान रविवार को विशेष प्रवचन माला का आयोजन हुआ। मुनि संवेगरत्न सागर ने श्रद्धालुओं को जीवन में उपकार, आत्मकल्याण और परोपकार का भाव अपनाने का संदेश दिया।

मुनिश्री ने कहा कि जिन शासन की परंपरा प्रत्येक जीव के प्रति दया, करुणा और कल्याण की भावना सिखाती है। जीवन में उपकार का भाव बना रहे तो व्यक्ति निरंतर गति और प्रगति की ओर बढ़ता है। उन्होंने उपकार के तीन प्रमुख रूप बताए, जिनमें जन कल्याण की भावना, स्व कल्याण की साधना और मानव कल्याण के लिए धर्म की देशना शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कल्याण की भावना रखना जन कल्याण है, जबकि आत्मकल्याण के लिए पुरुषार्थ करना स्व कल्याण है। मानव कल्याण के लिए धर्म और सद्मार्ग की देशना देना भी बड़ा उपकार है। उन्होंने कहा कि उपदेश का दान सबसे बड़ा दान है, क्योंकि इससे व्यक्ति को जीवन की सही दिशा मिलती है।

अनेक कष्टों के बाद मिला मानव जीवन

मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है। जीव ने अनेक भवों में अनेक प्रकार के दुखों का सामना करने के बाद यह मानव जन्म प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति केवल जीवन गुजारने के लिए जीता है, वह गुजर जाता है, लेकिन जो जीवन को सही अर्थों में जीता है, उसका जीवन सार्थक बन जाता है।

उन्होंने कहा कि मानव जीवन मिलने के बाद यदि ज्ञान की ज्योति नहीं जलाई गई तो व्यक्ति अज्ञान के अंधकार में भटकता रहेगा। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान बनना संभव है, लेकिन मानव जन्म के बिना यह संभव नहीं है। इसलिए इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

सत्संग से पवित्र होती है आत्मा

मुनिश्री ने मानव जीवन के विभिन्न स्तरों की चर्चा करते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने भीतर झांककर यह विचार करना चाहिए कि उसके आचरण में मानवीय गुण हैं या पशु प्रवृत्तियां। सच्चा मानव वही है, जो अनासक्त भाव से जीवन जीता है और दूसरों के कल्याण के साथ अपने आत्मकल्याण की दिशा में भी आगे बढ़ता है।

उन्होंने कहा कि अच्छा मानव बनने के लिए सत्संग सबसे बड़ा सहारा है। सत्संग में पतित व्यक्ति को भी संत बनने की प्रेरणा और सामर्थ्य मिलती है। आत्मा सत्संग से जुड़ी रहे तो धीरे-धीरे उसके भीतर पवित्रता का विकास होता है।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से दुर्लभ मानव जीवन को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं में व्यतीत करने के बजाय आत्मकल्याण, परोपकार और सद्मार्ग के लिए समर्पित करने का आह्वान किया।

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