‘छह ढाला’ में नरक गति के कष्टों का वर्णन, मुनिश्री ने दिया पाप त्याग का संदेश
बोले- सच्चा धर्मात्मा वही, जो संसार की हर आत्मा के हित और सुख-दुःख को अपनी आत्मा समान समझे

“दिगंबर जैन नवोदय तीर्थ में मुनि आगम सागर ने छह ढाला के प्रथम ढाला का वाचन करते हुए नरक गति के कष्टों और पापकर्मों के परिणाम समझाए, साथ ही अहिंसा व आत्मकल्याण का संदेश दिया…”
रायपुर, 10 अगस्त 2026। दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय रोड में चल रहे दिगंबर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग 2026 के अंतर्गत सोमवार को धर्म, भक्ति और ज्ञान से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां आयोजित हुईं। सुबह भगवान के अभिषेक, शांतिधारा और पूजन के बाद संतों के सान्निध्य में स्वाध्याय हुआ। इस दौरान पार्श्वनाथ जिनालय, टैगोर नगर के समाजजन भी बड़ी संख्या में शामिल हुए।
समयोपदेश वर्षायोग समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जैन गुरुकृपा एवं कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन ने बताया कि अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद मुनि पुनीत सागर ने तत्त्वार्थ सूत्र का स्वाध्याय कराया। वहीं मुनि आगम सागर ने छह ढाला के प्रथम ढाला का वाचन करते हुए नरक गति, पापकर्मों के परिणाम और आत्मकल्याण के मार्ग पर विस्तार से मंगल देशना दी।
स्वाध्याय को बताया महान तपस्या
मुनि आगम सागर ने कहा कि स्वाध्याय सुनना भी एक प्रकार की महान तपस्या है। इसका लाभ हर किसी को सहजता से नहीं मिलता, बल्कि इसके लिए विशेष पुण्य और रुचि की आवश्यकता होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार बच्चों को शुरुआत में पढ़ाई में रुचि नहीं होती, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ने की आदत लगने के बाद उनका मन उसी में रमने लगता है, उसी तरह धर्म और स्वाध्याय में भी रुचि विकसित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस दिशा में अपनी चाह और रुचि लगाता है, उसका मन उसी दिशा में आगे बढ़ता है। इसलिए आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को धर्म, स्वाध्याय और जिनवाणी से अपना जुड़ाव मजबूत करना चाहिए।
नरक गति में सुई की नोक बराबर भी सुख नहीं
छह ढाला के प्रथम ढाला का विवेचन करते हुए मुनिश्री ने नरक गति के स्वरूप और वहां जीवों को मिलने वाले कष्टों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि नरक गति में जीव को अत्यंत पीड़ादायक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और वहां सुई की नोक के बराबर भी सुख उपलब्ध नहीं होता।
मुनिश्री ने पापकर्मों के परिणामों को समझाते हुए बताया कि हिंसा, मांसाहार, मद्यपान और अन्य कषायों में लिप्त रहने वाले जीवों को कर्मों के अनुरूप दुखद परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि नरक गति के दुखों का वर्णन मनुष्य को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उसे पाप कर्मों से बचने और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए चेताने के उद्देश्य से किया गया है।
क्रोध, मान, माया और लोभ से दूर रहने की सीख
मुनि आगम सागर ने कहा कि जो व्यक्ति इस लोक और आने वाले भवों के दुखों से ऊपर उठना चाहता है, उसे पापकर्मों का त्याग कर जिनेंद्र भगवान की भक्ति और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। सच्चा जिनेंद्र भक्त धीरे-धीरे क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी चार कषायों से दूर होता जाता है।
उन्होंने आत्मा की गति का उदाहरण देते हुए कहा कि बुरे कर्मों के भार से आत्मा भारी होती है और जीव पतन की ओर जाता है, जबकि शुभ कर्म आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों और आचरण पर निरंतर विचार करते रहना चाहिए।
‘सच्चा धर्मात्मा हर जीव के हित की सोचता है’
मुनिश्री ने धर्मात्मा के लक्षण बताते हुए कहा कि सच्चा धर्मात्मा किसी भी प्राणी के प्राण लेने का विचार नहीं करता, बल्कि हर जीव की रक्षा और कल्याण का भाव रखता है। उन्होंने कहा, “सच्चा धर्मात्मा वही है जो अपनी आत्मा के समान संसार की समस्त आत्माओं के धर्म, हित और सुख-दुःख के बारे में सोचता है।”
उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में दया, अहिंसा, संयम और परोपकार के भाव को अपनाना ही सच्चे धर्म की पहचान है।
संतों की आहारचर्या का भी मिला लाभ
वर्षायोग के अंतर्गत सोमवार को मुनि आगम सागर, मुनि पुनीत सागर, एलक धैर्य सागर एवं एलक स्वागत सागर की आहारचर्या का लाभ विभिन्न पुण्यार्जक परिवारों को प्राप्त हुआ। इसके साथ ही अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और स्वाध्याय में बड़ी संख्या में समाजजनों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में उपस्थित धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं ने संतों की मंगल देशना का श्रवण किया। वर्षायोग के तहत नवोदय तीर्थ में प्रतिदिन स्वाध्याय, प्रवचन और धार्मिक गतिविधियों का क्रम जारी है।



