छत्तीसगढ़

दुर्ध्यान छोड़ सद्ज्ञान अपनाएं, तभी मिलेगा आत्मकल्याण : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर, 6 अगस्त 2026। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास के अंतर्गत आयोजित चातुर्मासिक प्रवचनमाला में मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि मनुष्य के जीवन का वास्तविक लक्ष्य दुर्ध्यान और अज्ञान से निकलकर सद्ज्ञान की ओर बढ़ना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मन के अशुभ भाव व्यक्ति को दुर्ध्यान की ओर ले जाते हैं, जबकि सही ज्ञान आत्मा को सुख, शांति और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है।

मुनिश्री ने कहा कि अज्ञान ही मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन में बांधे रखता है। इससे मुक्ति पाने के लिए प्रायश्चित, आत्मचिंतन और मोह-माया का त्याग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संसार के प्रति आसक्ति छोड़कर ज्ञान और ध्यान के माध्यम से आत्मा को निर्मल बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि सत्य का ज्ञान होने के बाद भी उसे जीवन में न अपनाना ही अज्ञान ध्यान है। यही अज्ञान मनुष्य को दुख, पीड़ा और दुर्गति की ओर ले जाता है। अविनयपूर्ण व्यवहार और गलत विचारों में उलझे रहना भी अज्ञान का ही स्वरूप है। सद्ज्ञान व्यक्ति के दर्शन को शुद्ध करता है और श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण करता है।

मुनिश्री ने कहा कि ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ जिस गुरु और जिनवाणी से ज्ञान मिला है, उनके प्रति सम्मान और भक्ति भी उतनी ही आवश्यक है। केवल प्रवचन सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिनवाणी के संदेशों को तत्काल जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है।

उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण के लिए केवल दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। जिस समर्पण और परिश्रम से मनुष्य शरीर की आवश्यकताओं के लिए कार्य करता है, उसी भावना से आत्मा के कल्याण के लिए भी प्रयास करना चाहिए। श्रावक जीवन का पहला कर्तव्य ज्ञान की पूजा, उसका सम्मान और उसकी साधना है। अज्ञान ध्यान अनेक भवों को बिगाड़ देता है, इसलिए सद्ज्ञान को अपनाकर आत्मोन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।

चातुर्मास में तप की साधना जारी

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुणिया और महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि सर्वमंगलमय वर्षावास में तप की साधना निरंतर जारी है। 49 दिवसीय पंच परमेष्ठी श्रेणी तप का दूसरा चरण चल रहा है। बुधवार को सभी तपस्वियों का व्यासना रहा। तप की श्रृंखला में श्रावक संयम बैद ने नौ उपवास और श्राविका पूजा सुराना ने भी नौ उपवास पूर्ण किए। धर्मसभा में दोनों तपस्वियों का सम्मान किया गया तथा उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनकी तपस्या की भावपूर्वक अनुमोदना की।

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