छत्तीसगढ़धर्म-आध्यात्म

ज्ञान की ओर बढ़े 193 तपस्वी, सामूहिक व्यसना के साथ आत्मकल्याण का संकल्प

रायपुर, 9 अगस्त 2026। विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास के दौरान तप, त्याग, साधना और आराधना का क्रम निरंतर जारी है। शनिवार को 193 तपस्वियों ने मुनि संवेगरत्न सागर के सानिध्य में मांगलिक के पश्चात सामूहिक व्यसना किया।

ज्ञान से जुड़ेगा मन,तभी सद्मार्ग का होगा ध्यान : मुनि संवेगरत्न सागर

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि संवेगरत्न सागर ने अज्ञान से बाहर निकलकर ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अज्ञान को दूर करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। अज्ञान आकर्षक लग सकता है, लेकिन उसके परिणाम सामने आने पर काफी नुकसान हो सकता है।

मुनिश्री ने कहा कि गलत चिंतन और अज्ञान की परंपरा जीव को विपरीत परिणामों की ओर ले जाती है। ऐसे में समय रहते इससे बाहर निकलना जरूरी है। ज्ञानियों द्वारा बताए गए मार्ग के प्रति अश्रद्धा और अविश्वास का प्रभाव केवल वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाले भवों की परंपरा को भी प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में मनुष्य के पास पुण्य का उदय और अनेक साधन-सुविधाएं हैं, लेकिन यदि वह अज्ञान में उलझा रहा तो सद्गति की दिशा से भटक सकता है। ज्ञान से जुड़ने पर ही सद्मार्ग का ध्यान होगा। देव, गुरु और धर्म के बताए मार्ग पर श्रद्धा के साथ चलकर ही सही दिशा और आत्मकल्याण की ओर आगे बढ़ा जा सकता है।

तप, त्याग और साधना का क्रम जारी

सर्वमंगलमय वर्षावास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया, उपाध्यक्ष गौतम लोढ़ा, राजेश निमाणी, अशोक पगारिया और अनिल लोढ़ा ने बताया कि श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चातुर्मास समिति की ओर से तपस्वियों के लिए सामूहिक व्यसना की व्यवस्था की जाती है। लाभार्थी परिवार ने तपस्वियों को व्यसना कराकर पुण्यलाभ लिया।

वर्तमान में श्री पंच परमेष्ठी श्रेणी तप और श्री गिरनार नेमी तप जारी है। दोनों तप के तपस्वियों का 8 अगस्त को व्यसना हुआ, जिसमें कुल 193 तपस्वियों ने सामूहिक रूप से व्यसना किया। तपस्वी एक घंटे के भीतर एक ही स्थान पर बैठकर व्यसना करते हैं। रविवार को दोनों तप के तपस्वियों का उपवास रहेगा।

धर्मसभा का संचालन चातुर्मास समिति के महासचिव सुरेश बरड़िया कर रहे हैं। वर्षावास के दौरान प्रतिदिन धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं शामिल होकर जिनवाणी का श्रवण कर रहे हैं। तपस्वी तप, त्याग और साधना के माध्यम से आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।

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