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पराली जलाने की आदत तोड़ने के लिए संवाद और स्थानीय रणनीति जरूरी

नई दिल्ली, 16 जून 2026। पंजाब में पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। किसानों के व्यवहार, जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों को समझते हुए समय पर प्रभावी संवाद और व्यवहार परिवर्तन आधारित रणनीति अपनाना जरूरी है। यह निष्कर्ष ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) की नई स्वतंत्र रिपोर्ट “Behaviour Change Approaches to Tackle Stubble Burning at Scale” में सामने आया है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 के बाद पराली जलाने की घटनाओं में कमी जरूर दर्ज की गई है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पंजाब के चार जिलों में 102 किसानों पर किए गए अध्ययन, फोकस ग्रुप चर्चाओं और सरकारी अधिकारियों से बातचीत में पाया गया कि जानकारी की कमी के साथ-साथ अविश्वास, सामाजिक मान्यताएं, वित्तीय दबाव और व्यावहारिक चुनौतियां भी किसानों के निर्णयों को प्रभावित कर रही हैं।

अध्ययन में सामने आया कि 78 प्रतिशत किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अनजान थे, जबकि 63 प्रतिशत किसानों को उस समय कोई जानकारी नहीं मिली जब उन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत थी। हालांकि 63 प्रतिशत किसान पराली जलाने की आदत छोड़ चुके हैं, लेकिन 31 प्रतिशत किसान अब भी आंशिक रूप से पराली जला रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि केवल जागरूकता और मशीनों की उपलब्धता इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है।

किसान पर्चों से नहीं, लोगों से लेते हैं ज्यादा जानकारी

रिपोर्ट के अनुसार किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन की सबसे अधिक जानकारी साथी किसानों और आपसी बातचीत से मिलती है। इसके बाद सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और मोबाइल संदेशों का स्थान है। इसके विपरीत पर्चे, सरकारी वेबसाइट और मोबाइल ऐप जैसे पारंपरिक माध्यमों की पहुंच सीमित पाई गई।

सर्वेक्षण में शामिल 62 प्रतिशत किसानों ने कृषि विस्तार अधिकारियों (Agriculture Extension Officers) को सबसे भरोसेमंद सूचना स्रोत माना। इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल माध्यम पहुंच बढ़ा सकते हैं, लेकिन भरोसा बनाने में आमने-सामने संवाद की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी बनी बड़ी चुनौती

रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल व्याख्यान आधारित रहे, जबकि किसानों को मशीनों के उपयोग और विकल्पों को अपनाने के लिए खेतों में व्यावहारिक प्रदर्शन की जरूरत है। वर्ष 2024-25 में पंजाब में आईईसी बजट का केवल 6.59 प्रतिशत हिस्सा ही फील्ड डेमोंस्ट्रेशन पर खर्च किया गया।

साथ ही मशीनों के उपयोग में किसानों के बीच आपसी सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सर्वे में शामिल 56 प्रतिशत किसानों ने मशीनें साथी किसानों से किराए पर लीं, जबकि 34 प्रतिशत ने कस्टम हायरिंग सेंटरों का सहारा लिया।

कीटों के डर से अब भी जलाई जा रही पराली

रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि आंशिक रूप से पराली जलाने वाले 67 प्रतिशत किसानों ने कीटों के हमले के डर को इसकी मुख्य वजह बताया। हालांकि इनमें से आधे से अधिक किसानों ने स्वयं कभी ऐसी समस्या का अनुभव नहीं किया था और वे केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर निर्णय ले रहे थे।

सीईईडब्ल्यू की फेलो प्रार्थना बोरा ने कहा कि पंजाब ने पराली जलाने की घटनाओं में कमी लाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन इस सुधार को स्थायी बनाने के लिए व्यापक जागरूकता अभियानों से आगे बढ़कर व्यवहार परिवर्तन आधारित संचार रणनीतियों को अपनाना होगा।

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

रिपोर्ट में पंजाब सरकार को फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत एक समर्पित ‘व्यवहार परिवर्तन संचार रणनीति’ शुरू करने की सलाह दी गई है। इसके तहत किसानों तक सही समय पर, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप और भरोसेमंद माध्यमों से जानकारी पहुंचाने पर जोर दिया गया है।

अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि सरकार अपने ‘फ्लेक्सी-फंड’ का उपयोग व्यवहार परिवर्तन आधारित पायलट परियोजनाओं पर करे और किसानों के लिए सरल, व्यावहारिक एवं परिणाम आधारित संचार मॉडल विकसित करे, ताकि पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

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