कचरे से कमाई: 2047 तक $51 अरब का बाजार और 26 लाख रोजगार संभव

“भारत का गीला कचरा अब बोझ नहीं, बल्कि रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा और 51 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का बड़ा अवसर बन सकता है…”
नई दिल्ली, 29 मई 2026। भारत के शहरों में तेजी से बढ़ता जैविक कचरा अब सिर्फ सफाई और प्रदूषण की चुनौती नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में यह देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण का बड़ा आधार बन सकता है। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद की एक विस्तृत रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि जैविक कचरे के प्रबंधन को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो वर्ष 2047 तक भारत में लगभग 51 अरब डॉलर का विशाल बाजार तैयार हो सकता है और करीब 26 लाख प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, रसोई, सब्जी मंडियों, बागवानी, होटल, रेस्तरां और अन्य स्रोतों से निकलने वाले गीले कचरे को संसाधन में बदलकर देश आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों स्तरों पर बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है। जैविक कचरे से खाद, बायोगैस, बायो-सीएनजी और जैविक उर्वरक तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ रासायनिक खादों पर निर्भरता भी कम होगी।
24 अरब डॉलर निवेश और उत्सर्जन में भारी कमी की संभावना
अध्ययन में बताया गया है कि बेहतर नीतियों और मजबूत प्रसंस्करण व्यवस्था के जरिए इस क्षेत्र में लगभग 24 अरब डॉलर तक का निवेश आकर्षित हो सकता है। यदि शहरों में जैविक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से संग्रह और प्रसंस्करण किया जाए, तो कार्बन उत्सर्जन में लगभग 68 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कमी लाई जा सकती है। वहीं महत्वाकांक्षी हरित परिवर्तन मॉडल अपनाने पर यह आंकड़ा 101 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि मौजूदा स्थिति बनी रही, तो 2047 तक कचरा क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन बढ़कर लगभग 120 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
शहरों में हर दिन निकल रहा 1.71 लाख टन कचरा
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में भारतीय शहरों से प्रतिदिन करीब 1.71 लाख टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमें लगभग आधा हिस्सा जैविक कचरे का होता है। लेकिन इसका बड़ा भाग अभी भी वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्कृत नहीं हो पाता। वर्तमान में कुल शहरी कचरे का केवल 61 प्रतिशत हिस्सा ही उपचारित किया जाता है।
अनुमान है कि वर्ष 2047 तक केवल शहरी क्षेत्रों से निकलने वाला जैविक कचरा सालाना 208 मिलियन टन तक पहुंच जाएगा। यदि इस कचरे को सही ढंग से खाद, बायोगैस और जैविक ईंधन में बदला जाए, तो यह भारत की स्वच्छ ऊर्जा नीति को नई दिशा दे सकता है।
स्वच्छ हवा और ऊर्जा सुरक्षा में भी बड़ी भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि खुले में कचरा जलाना शहरों में प्रदूषण का बड़ा कारण बन रहा है। इससे निकलने वाला धुआं और मीथेन गैस वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय शहरों में हानिकारक कण प्रदूषण का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा खुले में कचरा जलाने से जुड़ा हुआ है।
दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने रिपोर्ट जारी होने पर कहा कि कचरे को संसाधन में बदलना आत्मनिर्भर भारत और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि “जैविक कचरे से बनने वाला बायो-सीएनजी आयातित जीवाश्म ईंधन का मजबूत विकल्प बन सकता है।”
16 मंत्रालय पहले से जुड़े, लेकिन समन्वय की कमी
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देश में लगभग 16 मंत्रालय और सरकारी संस्थाएं पहले से जैविक कचरा प्रबंधन से जुड़ी हुई हैं। स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम और गोवर्धन जैसी योजनाओं के जरिए सरकार इस दिशा में काम कर रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए विभागों के बीच बेहतर समन्वय और निगरानी की जरूरत है।
रोजगार और नए उद्योगों के खुलेंगे रास्ते
रिपोर्ट के मुताबिक, जैविक कचरा प्रबंधन क्षेत्र में फीडस्टॉक प्रबंधन, प्रसंस्करण संयंत्र संचालन, तकनीकी रखरखाव और जैविक उत्पादों के विपणन जैसे क्षेत्रों में लाखों रोजगार पैदा हो सकते हैं। साथ ही, यह क्षेत्र नगर निकायों के लिए राजस्व का नया स्रोत भी बन सकता है।
रिपोर्ट में दिए गए प्रमुख सुझाव
रिपोर्ट में पांच प्रमुख सुझाव दिए गए हैं:
कचरे की स्रोत स्तर पर अलग-अलग छंटाई अनिवार्य की जाए
शहरों में कचरे के आंकड़ों को नियमित रूप से अपडेट किया जाए
गुणवत्ता आधारित अनुबंध प्रणाली लागू हो
स्थानीय निकायों और कर्मचारियों का प्रशिक्षण मजबूत किया जाए
खाद, जैविक उर्वरक और बायो-सीएनजी के लिए मजबूत बाजार तैयार किए जाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ने समय रहते जैविक कचरे को संसाधन में बदलने की दिशा में बड़े कदम उठाए, तो यह न केवल शहरों को स्वच्छ बनाएगा, बल्कि रोजगार, ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में भी देश को नई ताकत देगा।



